कुछ भी लिखने का मन नही
कुछ लिखने का मन नहीं कुछ भी पढने का मन नहीं बस उदास निराश हताश बैठा हूँ क्या करू क्या ना करु कुछ समझ नहीं आ रहा दुनिया की सूने या दिल की कुछ समझ नहीं आ रहा क्या हो रहा है क्यों हो रहा है कुछ भी समझ नहीं आ रहा कुछ भी करने का मन नहीं ना कुछ पाने की लालसा मूर्द कि तरह बे-एहतियात बैठा हूँ मुझे पहले कभी हुआ ना यह सब अब पत्ता नहीं क्यों हो रहा जो भी मुलाकात कर ने आ रहे थे वो सब दुआएं दिये जा रहे थे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों कीये जा रहते वो किसी से बात करने का मन नहीं कर रहा बस इस बेरुख़ी दुनिया दुर रहुँ यह मन किये जा रहा मैं रहुँ या ना रहुँ ना किसी कोई गम नहीं फिर भी मन किसी अपने को पास होने का अहसास करा रहा अब छोड़-छाड के यह दुनिया कहीं ओर जाएंगे जहाँ जात धर्म ना ऊँचे-नीचे बस प्यार का ही नाम हो कवि रवि दान चारण